27 April 2022

Hanuman Chalisa | हनुमान चालीसा

॥ हनुमान चालीसा ॥ Hanuman Chaalisa by aks9ns




॥ हनुमान चालीसा ॥
दोहा
श्रीगुरु चरन सरोज रज ननज मनु मुकुरु सुधारर ।
बरनऊँ रघुबर बबमल जसु जो दायकु फल चारर ॥
बुद्धधहीन तनु जाननके सुममरौं पवनकुमार ।
बल बुद्धध बबद्या देहु मोहहिं हरहु कलेस बबकार ॥
चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।
जय कपीस नतहुँ लोक उजागर ॥
राम दूत अतुमलत बल धामा ।
अिंजननपुत्र पवनसुत नामा ॥

महाबीर बबक्रम बजरिंगी ।
कुमनत ननवार सुमनत के सिंगी ॥
किंचन बरन बबराज सुबेसा ।
कानन कुिंडल कुिंधचत केसा ॥

हाथ बज्र औ ध्वजा बबराजै ।
काँधे मूँज जनेऊ साजै ॥
सिंकर सुवन केसरीनिंदन ।
तेज प्रताप महा जग बिंदन ॥

ववद्यावान गुनी अनत चातुर ।
राम काज कररबे को आतुर ॥
प्रभु चररत्र सुननबे को रमसया ।
राम लखन सीता मन बमसया ॥

सूक्श्म रूप धरर मसयहहिं हदखावा ।
बबकट रूप धरर लिंक जरावा ॥
भीम रूप धरर असुर सँहारे ।
रामचिंद्र के काज सँवारे ॥


लाय सजीवन लखन जजयाये ।
श्रीरघुबीर हरवि उर लाये ॥
रघुपनत कीन्ही बहुत बडाई ।
तुम मम वप्रय भरतहह सम भाई ॥

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं ।
अस कहह श्रीपनत किंठ लगावैं ॥
सनकाहदक ब्रह्माहद मुनीसा ।
नारद सारद सहहत अहीसा ॥

जम कुबेर हदगपाल जहाँ ते ।
कबब कोबबद कहह सके कहाँ ते ॥
तुम उपकार सुग्रीवहहिं कीन्हा ।
राम ममलाय राज पद दीन्हा ॥

तुम्हरो मिंत्र बबभीिन माना ।
लिंकेस्वर भए सब जग जाना ॥
जुग सहस्र जोजन पर भानू ।
लील्यो ताहह मधुर फल जानू ॥

प्रभु मुहद्रका मेमल मुख माहीिं ।
जलधध लाँनघ गये अचरज नाहीिं ॥
दुगगम काज जगत के जेते ।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥


राम दुआरे तुम रखवारे ।
होत न आज्ञा बबनु पैसारे ॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना ।
तुम रच्छक काहू को डर ना ॥

आपन तेज सिंहारो आपै ।
तीनों लोक हाँक तें काँपै ॥
भूत वपसाच ननकट नहहिं आवै ।
महाबीर जब नाम सुनावै ॥

नासै रोग हरै सब पीरा ।
जपत ननरिंतर हनुमत बीरा ॥
सिंकट तें हनुमान छुडावै ।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥

सब पर राम तपस्वी राजा ।
नतन के काज सकल तुम साजा ॥
और मनोरथ जो कोई लावै ।
सोई अममत जीवन फल पावै ॥

चारों जुग परताप तुम्हारा ।
है परमसद्ध जगत उजजयारा ॥
साधु सिंत के तुम रखवारे ।
असुर ननकिंदन राम दुलारे ॥


अष्ट मसद्धध नौ ननधध के दाता ।
अस बर दीन जानकी माता ॥
राम रसायन तुम्हरे पासा ।
सदा रहो रघुपनत के दासा ॥

तुम्हरे भजन राम को पावै ।
जनम जनम के दुख बबसरावै ॥
अिंत काल रघुबर पुर जाई ।
जहाँ जन्म हररभक्शत कहाई ॥

और देवता धचत्त न धरई ।
हनुमत सेई सबग सुख करई ॥
सिंकट कटै ममटै सब पीरा
जो सुममरै हनुमत बलबीरा ॥

जै जै जै हनुमान गोसाईं ।
कृपा करहु गुरु देव की नाईं ॥
जो सत बार पाठ कर कोई ।
छूटहह बिंहद महा सुख होई ॥

जो यह पढै हनुमान चलीसा ।
होय मसद्धध साखी गौरीसा ॥
तुलसीदास सदा हरर चेरा ।
कीजै नाथ हृदय मँह डेरा ॥
दोहा
पवनतनय सिंकट हरन मिंगल मूरनत रूप ।
राम लखन सीता सहहत हृदय बसहु सुर भूप ॥
आरती
मिंगल मूरती मारुत निंदन सकल अमिंगल मूल ननकिंदन
पवनतनय सिंतन हहतकारी हृदय बबराजत अवध बबहारी
मातु वपता गुरू गणपनत सारद मिव समेट ििंभू िुक नारद

चरन कमल बबन्धौ सब काहु देहु रामपद नेहु ननबाहु
जै जै जै हनुमान गोसाईं कृपा करहु गुरु देव की नाईं
बिंधन राम लखन वैदेही यह तुलसी के परम सनेही

॥ ससयावर रामचंद्रजी की जय॥


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